विश्वबंधुत्व की ओर सेतु: यहूदी परंपरा, उदारवादी चिंतन और संवाद की साझा राह

वर्तमान संदर्भों में ग्लोबल साउथ या दक्षिण एशिया के चिंतकों के लिए यह और भी आवश्यक हो गया है कि हम यहूदियों को और गहनता से Decode करें !

विश्वबंधुत्व की ओर सेतु: यहूदी परंपरा, उदारवादी चिंतन और संवाद की साझा राह

✍️लेखक: सुनील दत्त, पूर्व डायरेक्टर, पंजाबी साहित्य अकादमी

जब भी विश्व राजनीति में इज़राइल, फ़िलिस्तीन या पश्चिम एशिया की चर्चा होती है, तो “ज़ायोनिस्ट” और “यहूदी” शब्द अक्सर एक ही अर्थ में बोल दिए जाते हैं। परन्तु इतिहास और विचार की गहराई में जाएँ तो यह स्पष्ट होता है कि यह दोनों समान नहीं हैं। यहूदी होना एक धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान है, जिसकी जड़ें हजारों वर्ष पुरानी परम्परा, तोरा की शिक्षाओं और सामुदायिक जीवन में हैं। दूसरी ओर ज़ायोनिज़्म उन्नीसवीं सदी के अंत में उभरी एक राजनीतिक विचारधारा थी, जिसने यहूदियों के लिए एक राष्ट्रीय राज्य की स्थापना का लक्ष्य रखा। इस विचारधारा से प्रेरित होकर 1948 में इज़राइल राज्य की स्थापना हुई, किन्तु हर यहूदी ज़ायोनिस्ट हो—यह आवश्यक नहीं, और हर ज़ायोनिस्ट केवल धार्मिक कारणों से प्रेरित हो—यह भी आवश्यक नहीं। यह अंतर समझना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी के भीतर यहूदी समाज की वैचारिक विविधता दिखाई देती है।

इसी विविधता में एक ऐसी धारा भी है जिसे उदारवादी या लिबरल यहूदी विचार कहा जाता है। यह धारा यहूदी परम्परा की नैतिक शिक्षाओं—न्याय, दया और मानव गरिमा—को आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ जोड़कर देखती है। 

Reform Judaism, जिसे विश्व में यहूदी धर्म की सबसे उदार शाखाओं में गिना जाता है, लैंगिक समानता, धार्मिक सुधार और अंतरधार्मिक संवाद पर विशेष बल देता है। इसके अंतर्गत काम करने वाली संस्थाएँ अमेरिका और कनाडा में सैकड़ों सभागृहों और सामुदायिक केंद्रों के माध्यम से शिक्षा, सामाजिक सेवा और मानवाधिकार अभियानों में सक्रिय हैं। इनके अनेक रब्बी मुस्लिम और ईसाई नेताओं के साथ साझा प्रार्थना सभाएँ और संवाद कार्यक्रम आयोजित करते हैं। उनके लिए यहूदी पहचान का अर्थ केवल धार्मिक आचरण नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की प्रतिबद्धता भी है।

Conservative Judaism एक ऐसी धारा है जो परम्परा और आधुनिकता के बीच संतुलन बनाने का प्रयास करती है। यह इज़राइल के अस्तित्व का समर्थन करती है, परन्तु साथ ही फ़िलिस्तीनी अधिकारों और शांतिपूर्ण समाधान की आवश्यकता पर भी बल देती है। इसके धार्मिक विद्यालय, सामुदायिक केंद्र और अंतरधार्मिक मंच अमेरिका में सक्रिय हैं। कई स्थानों पर मुस्लिम समुदायों के साथ मिलकर वे घृणा-अपराध विरोधी अभियानों और सांस्कृतिक संवाद में भाग लेते हैं।

धार्मिक धाराओं के अतिरिक्त कुछ राजनीतिक और नागरिक समाज आधारित संगठन भी हैं। J Street अमेरिका में स्थापित एक ऐसा संगठन है जो स्वयं को “Pro-Israel, Pro-Peace” कहता है। इसका उद्देश्य अमेरिकी नीति-निर्माताओं के बीच दो-राष्ट्र समाधान और कूटनीतिक प्रयासों के समर्थन में आवाज़ उठाना है। इसके सम्मेलनों में अमेरिकी सांसद, नीति विशेषज्ञ और कभी-कभी अरब मूल के वक्ता भी भाग लेते हैं। विश्वविद्यालयों में J Street U के नाम से इसकी छात्र शाखाएँ हैं, जहाँ युवा पीढ़ी को संवाद और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के विचार से परिचित कराया जाता है।

Jewish Voice for Peace एक अन्य अमेरिकी संगठन है, जो अधिक आलोचनात्मक रुख अपनाता है। यह इज़राइली नीतियों की खुली आलोचना करता है और फ़िलिस्तीनी अधिकारों के समर्थन में अभियान चलाता है। इसके सदस्य कई बार मुस्लिम संगठनों के साथ मिलकर संयुक्त वक्तव्य जारी करते हैं और नस्लीय भेदभाव तथा इस्लामोफोबिया के विरोध में कार्यक्रम करते हैं। उनके लिए यहूदी नैतिकता का अर्थ है उत्पीड़न के विरुद्ध खड़ा होना—चाहे वह कहीं भी हो।

इज़राइल के भीतर New Israel Fund जैसी संस्था लोकतांत्रिक मूल्यों और अल्पसंख्यक अधिकारों को सुदृढ़ करने के लिए कार्य करती है। यह अरब नागरिकों के अधिकार, लैंगिक समानता और न्यायिक स्वतंत्रता जैसे विषयों पर काम करने वाले संगठनों को सहयोग देती है। इसका उद्देश्य एक “साझा समाज” की परिकल्पना को मजबूत करना है, जहाँ यहूदी और अरब नागरिक समान अधिकारों के साथ रह सकें।

अमेरिका में इन उदारवादी संगठनों की उपस्थिति सबसे मजबूत है। वहाँ इनके पास संस्थागत ढाँचा, फंडिंग नेटवर्क और सार्वजनिक विमर्श में भागीदारी का अवसर है। वे कांग्रेस के सदस्यों से मिलते हैं, नीति पर चर्चा करते हैं और विश्वविद्यालयों में विचार-विमर्श आयोजित करते हैं। मुस्लिम संगठनों के साथ उनकी साझेदारी नागरिक अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता के मुद्दों पर देखी जा सकती है।

भारत में इन संगठनों की औपचारिक शाखाएँ नहीं हैं। भारत का यहूदी समुदाय ऐतिहासिक रूप से छोटा और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का उदाहरण रहा है। इसलिए यहाँ इन अमेरिकी उदारवादी संस्थाओं की सक्रियता मुख्यतः शैक्षणिक और सांस्कृतिक संवाद तक सीमित है। कभी-कभी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों या वेबिनार के माध्यम से संपर्क बनता है, पर भारत-इज़राइल संबंधों की दिशा मुख्यतः सरकारी और रणनीतिक स्तर पर तय होती है।

मुस्लिम देशों में स्थिति विविध है। जहाँ इज़राइल के साथ कूटनीतिक संबंध स्थापित हुए हैं, वहाँ नागरिक समाज स्तर पर संवाद की संभावनाएँ बढ़ी हैं। संयुक्त अरब अमीरात या मोरक्को जैसे देशों में अंतरधार्मिक सम्मेलनों में यहूदी और मुस्लिम विद्वान साथ बैठते हैं। 

अंततः किसी भी समुदाय को एकरूप समझना वास्तविकता का सरलीकरण है। यहूदी समाज के भीतर भी विविध विचारधाराएँ हैं—राष्ट्रवादी, धार्मिक, उदारवादी और आलोचनात्मक। उदारवादी यहूदी संस्थाएँ और नेता यह दर्शाते हैं कि धार्मिक पहचान और नैतिक उत्तरदायित्व को विश्व बंधुत्व और संवाद के साथ जोड़ा जा सकता है। उनकी उपलब्धियाँ सीमित हो सकती हैं, पर वे उस पुल की तरह हैं जो संघर्षों के बीच संवाद का रास्ता खुला रखता है।